top of page
A small poem by Amaan Raza about friendship.
ग़मों की क़ैद से मुझको जाने कैसे निकाल लेते हो,
मैं जब भी गिरता हूं ऐ दोस्त, तुम मुझे संभाल लेते हो।
कुछ हँसी, कुछ ख़ुशी, कुछ मज़ाक के कमरे बनाए हैं,
ऐ आलिम-ऎ-दुनिया तुम मुझसे, दोस्ती का हिसाब लेते हो।
ज़माने भर की मारों से थककर, जब भी अकेला बैठ जाता हूँ,
तुम सब वहीं खड़े मिलते हो, ना जाने कैसे जान लेते हो।
न रिश्ते खून के अपने, न हैं ताल्लुक ज़मानो से,
मगर फिर भी ना जाने क्यूँ, लुटा तुम जान देते हो।
हुए हो कर्जदार इनके, अमान अब कैसे चुकाओगे?
क्यों ना तुम ज़िन्दगी दो चार, इन्हीं पे वार देते हो।
-- अमान रज़ा
A reply on his poem followed by a question.
तुझे सँभालते थे, क्यूंकि तुझको हम जानते थे,
तू जो छुपाता था, हम उसे भी पहचानते थे।
हिसाब की बात आयी है तो तुम चुका दो यह उधारी,
ज्यादा कुछ नहीं ठीक से निभा दो यह यारी।
अकेले तो तुमको छोड़ेंगे नहीं,
हम नहीं, तो हमारी यादें आ जाएँगी तुमसे मिलने।
न खून, न ताल्लुकात के अपने थे, बस हम भी उतने वक़्त के मारे थे ,
सस्ती जान न मांग हम से, साथ जीने का वक़्त मांग ले हम से।
चुकाना तो पड़ेगा यह कर्ज़ तुझे, सूद के साथ,
करना पड़ेगा नाम इतना अमान का नाम हम भी बोले "अपना ही यार है"
सवाल: गुस्से से कब तक जवाब देगा, कितनो को जवाब देगा?
खुद के सवाल को पढ़, खुद के जवाब कब देगा ?
For more updates on Amaan Raza, follow him on Instagram.
Contributor: Testimonials
bottom of page